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मूँह की बात सुने हर कोई,
दिल के दर्द को जाने कौन
आवाजों के बाज़ारों में,
खामोशी पहचाने कौन !!

सदियों-सदियों वही तमाशा,
रस्ता-रस्ता लम्बी खोज,
लेकिन जब हम मिल जाते हैं,
खो जाता हैं जाने कौन !!

वो मेरा आईना हैं,
मैं उस की परछाई हूँ,
मेरे ही घर में रहता हैं,
मुझ जैसा ही जाने कौन !!

किरन-किरन अलसाता सूरज,
पलक-पलक खुलती नींदें,
धीमे-धीमे बिखर रहा हैं,
ज़र्रा-ज़र्रा जाने कौन !!

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Jagjit Singh

जगजीत सिंह (February 8, 1941 - October 10, 2011)

शाम से आँख में नमी सी है,
आज फिर आपकी कमी सी है,

दफ़्न कर दो हमें कि सांस मिले,
नब्ज़ कुछ देर से थमी सी है,

वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर,
इसकी आदत भी आदमी सी है,

कोई रिश्ता नहीं रहा फिर भी,
एक तस्लीम लाज़मी सी है.

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P.S. – Its impossible for anyone to pick the most favourite gazals from his collection … the above two are those which came to my mind first .. Rest in Peace Sir !

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