Tags
These are lines out of a letter written by Shaheed Bhagat Singh ji to his cousin brother, 20 days before 23rd March, 1931.
उसे ये फिक्र है हरदम नया तर्जे-ज़फ़ा* क्या है,
हमें यह शौक है देखें सितम कि इन्तहा क्या है।दहर* से क्यों खफा रहें, चर्ख* का क्यों गिला करें,
सारा ज़हां अदू* सही, आओ मुकाबला करें।कोई दम का मेहमाँ हूँ ऐ अहले-महफ़िल,
चरागे-सहर* हूँ बुझा चाहता हूँ।हवा में रहेगी मेरे ख्याल कि बिजली,
ये मुस्ते-खाक* है फ़ानी*, रहे रहे न रहे।~ शहीद-ए-आज़म
* ( तर्जे-ज़फ़ा – injustice; दहर – world; चर्ख – sky; अदु – enemy; सहर – morning; मुश्ते-खाक – a handful of dust/human-body; फ़ानी – fragile )
Advertisement